देश भर में सात सौ से अधिक इसके डेरे हैं। इनमें 1.50 लाख से अधिक संत जुड़े हुए हैं। संस्कृत महाविद्यालयों के साथ धर्म प्रचार केंद्रों का संचालन भी यह अखाड़ा कर रहा है।अखाड़े के सचिव जगतार मुनि बताते हैं कि नैतिक मूल्यों के संरक्षण के साथ ही राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने के लिए लगातार काम हो रहा है।
देव भाषा संस्कृत, संस्कृति, ज्ञान, भक्ति और नैतिकता की अलख जगाने वाला है पंचायती नया उदासीन अखाड़ा। श्वेत वस्त्रधारी संतों वाले इस अखाड़े में पंच प्रेसीडेंट ही सर्वोपरि होते हैं। बिना इनके यहां कोई फैसला नहीं होता। इस अखाड़े की स्थापना हरिद्वार के कनखल में राजघाट पर 1902 में हुई थी।उदासी परंपरा के तीन प्रमुख अखाड़ों में पंचायती अखाड़ा नया उदासीन ज्ञान-भक्ति के साथ देव भाषा के प्रचार के लिए लंबे समय से जुटा हुआ है।
देश भर में सात सौ से अधिक इसके डेरे हैं। इनमें 1.50 लाख से अधिक संत जुड़े हुए हैं। संस्कृत महाविद्यालयों के साथ धर्म प्रचार केंद्रों का संचालन भी यह अखाड़ा कर रहा है।अखाड़े के सचिव जगतार मुनि बताते हैं कि नैतिक मूल्यों के संरक्षण के साथ ही राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने के लिए लगातार काम हो रहा है। अखाड़े की स्थापना बनखंडी निर्वाणदेव जी ने की थी।
महाकुंभ की पेशवाई हो, शाही स्नान या फिर कोई और शुभ कार्य, सबसे आगे गुरु के प्रतीक तौर पर संगत साहिब की सवारी चलती है।इसके पीछे संतों का कारवां चलता है। जगतार मुनि बताते हैं कि उदासीन संप्रदाय के संत पंचतत्व की पूजा करते हैं। उदासीन सिख साधुओं का संप्रदाय है। श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण के मौजूदा पंच प्रेसिडेंट श्रीमहंत धूनी दास हैं।दक्षिण पंगत के मुखिया महंत भगत राम पर महाकुंभ की जिम्मेदारी है।
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