Wednesday, February 18, 2026
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High Court : सिविल मुकदमों में हार के बाद शुरू आपराधिक कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल मुकदमों में लगातार हार के बाद उन्हीं आधारों पर शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसे कायम रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल मुकदमों में लगातार हार के बाद उन्हीं आधारों पर शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इसे कायम रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की अदालत ने परशुराम व अन्य की ओर से सीजेएम सिद्धार्थनगर के समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार करते हुए की।

अभियोजन की कहानी के मुताबिक 19 जून 2006 को एक महिला ने मुकदमा दाखिल कर दावा किया कि वह मृतक कुन्नू की इकलौती पुत्री है। पिता की मृत्यु तीन फरवरी 2005 को हुई थी। शादी के बाद वह नेपाल में रह रही थी। आरोप है कि याचीगणों ने पिता की संपत्ति की फर्जी वसीयत 28 अगस्त 1988 की तिथि से बनवाकर रजिस्ट्री करवा ली। सीजेएम ने इस प्रारंभिक बयान के बाद याचियों के खिलाफ समन जारी कर दिया।

इसके खिलाफ याचियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि वसीयत में विपक्षी पुत्री को भी 1/5 हिस्सा दिया गया है। उसी वसीयत को चुनौती देते हुए उसने पहले सिविल वाद दाखिल किया जो खारिज हो गया, फिर अपील व द्वितीय अपील भी खारिज हुई। सिविल मुकदमों में लगातार असफल होने के बाद उन्हीं आधारों पर आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।

वहीं, सरकारी वकील ने दलील दी कि फर्जी वसीयत बनाना आपराधिक कृत्य है और समन आदेश उचित है, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को मानने से इन्कार कर दिया। कहा कि सिविल विवाद के निपट जाने के बाद आपराधिक प्रक्रिया दुरुपयोग की श्रेणी में आती है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सीजेएम की ओर से जारी समन आदेश व संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

 

 

 

Courtsy amarujala
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