उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की राजनीति अब निर्णायक चौराहे पर आ खड़ी हुई है। 2027 का विधानसभा चुनाव उनके लिए अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। यदि इस बार भी सत्ता उनकी पहुंच से बाहर रही, तो समाजवादी पार्टी इतिहास के हाशिये पर धकेल दी जाएगी और अखिलेश उन नेताओं की फेहरिस्त में गिने जाएंगे जिन्होंने अवसरों को देखा तो जरूर, मगर साध नहीं सके।
भाजपा के चाकचौबंद जातीय ताने-बाने के बरक्स अखिलेश ने ‘पीडीए’- पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक-का नारा गढ़ा है। लेकिन यह नारा काग़ज़ पर जितना आकर्षक दिखता है, ज़मीन पर उतना ही खोखला साबित हो रहा है। गैर-यादव पिछड़ों में वे अब तक कोई ठोस सेंध नहीं लगा सके हैं। कुर्मी, मौर्य, निषाद जैसी बड़ी जातियाँ भाजपा के साथ दीवार की तरह खड़ी हैं, और उन्हें खिसकाना अखिलेश के लिए लगभग असंभव साबित हो रहा है। यादवों की पारंपरिक गोलबंदी भी अब शिथिल हो चुकी है; मुलायम सिंह यादव के जमाने की वह जुनूनी एकजुटता अब केवल स्मृति बनकर रह गई है। महज यादव वोटों के सहारे सत्ता का सपना देखना अब राजनीतिक भोलेपन से अधिक कुछ नहीं रह गया है।
दलित वोट बैंक पर अखिलेश की गिद्ध दृष्टि अब किसी से छिपी नहीं है। एक दलित सांसद को मोहरा बनाकर दलित समाज में सेंधमारी की उनकी कोशिश अब तक निष्प्रभावी रही है। बसपा ने दशकों में दलित अस्मिता का जो दुर्ग रचा है, उसे अखिलेश जैसे प्रतिद्वंद्वी के लिए मायावती यूँ ही नहीं छोड़ेंगी। चुनाव नज़दीक आते ही मायावती ‘गेस्ट हाउस कांड’ की स्मृति को फिर से जीवित करेंगी और इसे दलित स्वाभिमान के अपमान के रूप में भुनाएँगी। ऐसी स्थिति में अखिलेश की दलितों के बीच की गई तमाम कोशिशें उनके ही ख़िलाफ़ भारी पड़ सकती हैं।
भाजपा का संभावित जातीय नैरेटिव अखिलेश के लिए और भी घातक सिद्ध हो सकता है। यदि भाजपा यह विमर्श गढ़ती है कि यादवों ने पिछड़ा वर्ग का लाभ disproportionate रूप से हड़प लिया है, और आँकड़ों के जरिये इस धारणा को पुष्ट करती है, तो गैर-यादव पिछड़ी जातियों में यादव विरोध की आग और भड़क सकती है। स्वतंत्रदेव सिंह और केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेता इस विषय को उछाल सकते हैं। यह दोनों पिछड़े वर्ग के नेता सभा-सम्मेलनों में यह कहें कि भाजपा विधानसभा में एक विधेयक लाने की तैयारी में है, जिसके तहत यादवों को ‘सामान्य वर्ग’ में डाले जाने का प्रस्ताव रखा जाएगा ताकि अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण का वास्तविक लाभ मिल सके। यदि ऐसा होता है, तो यह कदम अखिलेश के जातीय समीकरण को जड़ से हिला देगा। इससे एक ओर यादवों के भीतर असुरक्षा और आक्रोश का विस्फोट होगा, वहीं दूसरी ओर अन्य पिछड़ी जातियाँ समाजवादी पार्टी से स्थायी दूरी बना लेंगी।
अखिलेश यादव की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उनके पास इस समय कोई ऐसा प्रचंड नैरेटिव नहीं है जो भाजपा के विराट सांगठनिक व जातीय समीकरण को चुनौती दे सके। न कोई सशक्त सामाजिक गठबंधन है, न ही कोई सधी हुई सांगठनिक रणनीति। दलित दूर हैं, गैर-यादव पिछड़े किनारे खड़े हैं, और अल्पसंख्यक भी भ्रमित अवस्था में हैं।
ऐसे में अखिलेश के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वे अपनी राजनीति की दिशा में मूलभूत परिवर्तन करें। केवल पिछड़ों और दलितों पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें अगड़ों – विशेषकर ब्राह्मण और बनिया समुदाय-(लेकिन भाजपा ने इधर भी क्रमशः बृजेश पाठक और नंदगोपाल नंदी को लगा रखा है) के एक बड़े हिस्से को साधने की ठोस रणनीति बनानी चाहिए। इन वर्गों में भाजपा के प्रति मौन असंतोष के संकेत दिखाई देते रहे हैं; यदि अखिलेश इन्हें विश्वास में लेने में सफल होते हैं, तो वे अपने समीकरण में नई ऊर्जा भर सकते हैं। अन्यथा वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अवसरवादी लेकिन असफल नेता के रूप में इतिहास के गर्त में समा जाएंगे।
Anveshi India Bureau



