जाने माने बांसुरी वादक पंडित हरि प्रसाद चौरसिया बोले- जो लोग कल्चर का अर्थ नहीं जानते, वह संस्कृति और संगीत विभाग का नेतृत्व कर रहे हैं। आने वाली पीढ़ी को वह समृद्ध सांस्कृतिक चेतना और विरासत से कितना जोड़ पाएंगे, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
बांसुरी की तान से भारतीय संगीत का विश्व पटल पर डंका बजाने वाले पद्मविभूषण पं. हरि प्रसाद चौरसिया बेसुरे दौर से बेहद आहत हैं। वह कहते हैं, संगीत को बेसुरा बनाने की होड़ है। यह चिंता का विषय है। मेरे हाथ में बंदूक होती तो मैं ऐसे लोगों को गोली मार देता।
महाकुंभ की सांस्कृतिक यात्रा के शुभारंभ के लिए प्रयागराज आए बांसुरी सम्राट पं. हरि प्रसाद चौरसिया ने शुक्रवार को अमर उजाला से खास बातचीत में संगीत, संस्कृति, समाज और राजनीति से जुड़े प्रसंगों पर अपने अनुभवों को साझा किया। सिविल लाइंस के एक होटल में उन्होंने कहा, संगीत को बर्बाद वो लोग कर रहे हैं, जिनको ज्ञान नहीं है।
वह चिंता जताते हुए कहते हैं, इस देश में दारू बंद नहीं हो रही है, लेकिन कलाकारों और उनकी संगीत साधना के पहचान दिलाने वाले रेडियो बंद हो रहे हैं। बांसुरी को साधकर विश्व में भारतीय संगीत की सुगंध बिखेरने के सवाल पर वह कहते हैं कि यह ऐसा वाद्य है जिसे लेकर आने-जाने पर कोई सुरक्षा का खतरा नहीं है। बांस का टुकड़ा है। कोई खर्च भी नहीं है।
किसी भी विश्वविद्यालय में बांसुरी का कोई विभाग नहीं
यही ऐसा बाजा है जिसमें बिना तार-चमड़ा के ही सांस की दमकशी से अनूठे स्वर, छंद, अलंकार निकलते हैं, लेकिन हमारे देश के किसी भी विश्वविद्यालय में बांसुरी का कोई विभाग नहीं है। बांसुरी जैसा वाद्ययंत्र नहीं पढ़ाया जाता।
उस्ताद जाकिर हुसैन के बहाने वतन की मिट्टी के लिए दी नसीहत
उन्होंने ताल नाद के महानायक उस्ताद जाकिर हुसैन को भी याद किया। कहा कि उस्ताद अमेरिका में जाकर बस गए और वहीं उनका इंतकाल भी हो गया। हमेशा अपने वतन की मिट्टी से प्यार करना चाहिए। मुझे जर्मनी, जापान, अमेरिका और इंग्लैंड कभी प्रिय नहीं लगा। मेरा मानना है कि चाहे संगीतकार बनिए या डाॅक्टर-इंजीनियर। अपने वतन के लिए काम करना चाहिए। दूसरे देश में जितना भी करेंगे, कोई आपके ऊपर भरोसा नहीं करेगा।
पृथ्वी का स्वर्ग है प्रयागराज, चाहता हूं जब भी जन्म लूं इसी धरती पर लूं
बच्चे से भी बढ़कर यहां के लोग मुझे करते हैैं प्यार। जीवन में पहली बार प्रयाग में बांसुरी खामोश है। आज लोग मुझे सुनना चाहते हैं, बांसुरी नहीं। जबकि, मैं बातें नहीं करता, बांसुरी बजाता हूं। मौका मिला तो महाकुंभ में भी बांसुरी की तान संगम तट पर सुनाऊंगा।
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