इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस जांच में दोषमुक्त होने के बाद भी गवाहों के बयानों पर आरोपी को समन जारी किया जा सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस जांच में दोषमुक्त होने के बाद भी गवाहों के बयानों पर आरोपी को समन जारी किया जा सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता (आईपीसी) की धारा-319 के तहत मुकदमे में साक्ष्य का अर्थ केस डायरी या चार्जशीट की सामग्री से नहीं, बयानों से है। ट्रायल कोर्ट के पास इसे जारी करने की असाधारण शक्ति है। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अब्दुल शहीद की एकल पीठ ने जय नाथ प्रजापति की आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी खारिज कर दी।
जौनपुर के बदलापुर थाना क्षेत्र में 29 मई 2021 को फौजदार प्रजापति की हत्या कर दी गई थी। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि घर लौटते वक्त संगीता फॉर्म हाउस के पास आरोपियों ने उन पर रंजिश में गोली चला दी थी। इससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। पुलिस ने याची जय नाथ प्रजापति के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल नहीं किया था और उसे दोषमुक्त कर दिया था। हालांकि, मुकदमे के दौरान गवाहों के बयानों के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने उसे धारा-319 के तहत अतिरिक्त आरोपी के रूप में तलब किया। इस आदेश के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि एफआईआर 15 घंटे की देरी से दर्ज की गई थी और गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास है। जांच में कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर ही याची को दोषमुक्त किया गया था। वहीं, प्रतिवादी के अधिवक्ता ने दलील दी कि मृतका की पत्नी और अन्य चश्मदीद गवाहों ने ट्रायल के दौरान सीधे तौर पर जय नाथ प्रजापति की संलिप्तता और गोलीबारी में शामिल होने की बात कही।
कोर्ट ने कहा कि पति की हत्या के बाद पत्नी की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी। इसलिए 15 घंटे की देरी उचित और स्वाभाविक है। ऐसे में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा कि धारा-319 के तहत साक्ष्य का अर्थ मुकदमे के दौरान दर्ज किए गए बयानों से है, न कि केस डायरी या चार्जशीट की सामग्री से। गवाहों की ओर से जय नाथ का नाम विशेष रूप से लिए जाने के बाद उसे समन करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह कानूनी है।
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