इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत एक कंप्यूटर ऑपरेटर की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच के दौरान जांच अधिकारी का काम केवल आरोपों की सत्यता की जांच करना है, न कि सजा का प्रस्ताव देना।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत एक कंप्यूटर ऑपरेटर की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच के दौरान जांच अधिकारी का काम केवल आरोपों की सत्यता की जांच करना है, न कि सजा का प्रस्ताव देना। यह आदेश न्यायमूर्ति विकास बुधवार की पीठ ने दिया है। याची अनिल कुमार पटेल वर्ष 2017 में कंप्यूटर ऑपरेटर ग्रेड-ए के पद पर नियुक्त हुए थे। इनके विरुद्ध 2021 में झांसी में एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। इसके आधार पर उन्हें निलंबित कर दिया गया और उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई।
जांच अधिकारी ने 12 दिसंबर 2022 को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें उन्होंने न केवल याचिकाकर्ता को दोषी पाया, बल्कि याची को सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश भी कर दी । इसी सिफारिश के आधार पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, झांसी ने 19 फरवरी 2023 को उन्हें बर्खास्त कर दिया था। इस आदेश को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय गौतम, अधिवक्ता आर्या गौतम ने दलील दी कि बर्खास्तगी का विवादित आदेश कानूनन टिकने योग्य नहीं है क्योंकि जांच अधिकारी ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए सजा का प्रस्ताव दिया था। जबकि जांच अधिकारी को केवल आरोपों के आधार पर सत्यता की जांच करना था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करने की मांग की। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि जांच अधिकारी ने सजा का प्रस्ताव देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। अदालत ने माना कि यह त्रुटि मामले की जड़ में है, जिससे पूरी कार्यवाही दूषित हो गई है। हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए मामले को वापस अनुशासनात्मक प्राधिकारी को भेज दिया है।
कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि दो सप्ताह के भीतर एक नया जांच अधिकारी नियुक्त किया जाए। जांच की प्रक्रिया याचिकाकर्ता की ओर से पहले दिए जा चुके जवाब के स्तर से दोबारा शुरू की जाए और इसे दो महीने के भीतर पूरा किया जाए। डीजीपी को इस आदेश की प्रति भेजी जाए ताकि भविष्य में जांच अधिकारियों को कानूनी स्थिति के बारे में शिक्षित किया जा सके और ऐसी गलतियां दोबारा न हो। तब तक याचिकाकर्ता की स्थिति वही रहेगी जो बर्खास्तगी आदेश पारित होने के समय थी।
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