इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक किसी विवाह को शून्य घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक पत्नी अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार बनी रहती है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक किसी विवाह को शून्य घोषित नहीं कर दिया जाता, तब तक पत्नी अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार बनी रहती है। यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने पत्नी की ओर से भरण-पोषण के लिए दाखिल अर्जी को स्वीकार कर लिया और पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही नए सिरे से फैसले पर विचार करने के लिए मामले को वापस भेज दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने श्वेता जायसवाल की पुनरीक्षण अर्जी पर दिया।
चंदौली निवासी श्वेता जायसवाल ने प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय में पति से भरण-पोषण के लिए वाद दायर किया था। न्यायालय ने नवंबर 2017 के आदेश से कहा कि पति के पहली शादी को छुपाने के आधार पर पत्नी अलग रह रही है। वह स्वयं पत्नी होने का कर्तव्य नहीं निभा रही। पत्नी पिछली शादी को छिपाने के आधार पर विवाह शून्यता की डिक्री प्राप्त कर सकती है। इसलिए वह भरण-पोषण की हकदार नहीं है। हालांकि उनकी नाबालिग बेटी के लिए 2,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण की अनुमति दी गई थी। इस आदेश के खिलाफ याची पत्नी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण अर्जी दाखिल की।
हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पारिवारिक न्यायालय के फैसले रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक एक शून्यकरणीय विवाह को डिक्री से शून्य घोषित नहीं किया जाता, तब तक विवाह बना रहता है। कोर्ट ने मामले को पारिवारिक न्यायालय को वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि वह भरण-पोषण के दावे के संबंध में नए सिरे से आदेश पारित करें। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग बेटी को दिए गए भरण-पोषण में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। आदेश प्राप्त होने के बाद और पार्टियों को उचित नोटिस देने के बाद तीन महीने की अवधि के भीतर मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया गया है। आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली गई है।
Courtsy amarujala