Saturday, February 21, 2026
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हाईकोर्ट की टिप्पणी : इस्लाम ने आदिकाल में दी थी सशर्त द्विविवाह की अनुमति, आज हो रहा दुरुपयोग

इस्लाम में बहुविवाह आदि काल में समय की मांग थी। कबिलाई टकराव के वक्त महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के लिए शुरू हुई यह प्रथा अब मुस्लिम महिलाओं के लिए जी का जंजाल बन गई है। पुरुष इसका दुरुपयोग कर रहे हैं। लिहाजा मौजूदा हालात में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू किया जाना जरूरी हो गया है। विधयिका को इस दिशा में विचार करना चाहिए।

इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत ने द्विविवाह के आरोपी मुरादाबाद निवासी फुरकान की याचिका को विचारणीय माना है। हालांकि, कोर्ट ने याची के खिलाफ शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाते हुए सरकार व याची की पत्नी को नोटिस जारी कर जबाव-तलब किया है। साथ ही कहा कि मौजूदा कानून के मुताबिक मुस्लिम पुरुष को बहु- विवाह की इजाजत है।

मामला मुरादाबाद के मैराथन थाना क्षेत्र का है। फुरकान पर उसकी पत्नी ने पहली शादी को छुपाकर उससे दूसरी शादी रचाने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया था। पुलिस ने दुष्कर्म सहित द्विविवाह की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर आरोप पत्र ट्रायल कोर्ट में दाखिल किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दाखिल आरोप पत्र का संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याची अधिवक्ता ने दलील दी कि इस्लाम धर्म के मुताबिक मुस्लिम पुरुष चार विवाह कर सकता है। यह गैर कानूनी नहीं है। लिहाजा द्विविवाह के धाराओं में मुकदमा दर्ज करना व बतौर आरोपी अदालत में तलब किया जाने का आदेश अवैध है। 

कोर्ट की टिप्पणी

इस्लाम धर्म में बहुविवाह की अनुमति भी सशर्त ही है। इसका ऐतिहासिक कारण है। अरब में आदिम कबिलाई झगड़ों में बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा व बच्चे अनाथ हो गए थे। अनाथ बच्चों की सुरक्षा व संरक्षा के लिए बहु-विवाह की प्रथा शुरू हुई थी। लेकिन, अब हालात बदल गए हैं। यही वजह है कि देश में समान नागरिक संहिता की मांग उठ रही है। इस पर विधायिका को गंभीरता से विचार करना चाहिए – हाईकोर्ट

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा किभारत के संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक आस्था के अनुसार व्यक्ति को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा संविधान के भाग-तीन के अन्य प्रावधानों के अधीन है। इसलिए, अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता अप्रतिबंधित नहीं है और इसे राज्य द्वारा विनियमित किया जा सकता है।

इस्लाम के धार्मिक ग्रंथों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि …यह स्पष्ट है कि धार्मिक ग्रंथ पुरुषों से कहता है कि पहले अनाथों की देखभाल के बारे में सोचें और केवल तभी जब उन्हें लगे कि वे अकेले रहकर अनाथों के हितों के साथ न्याय करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, उन्हें उनकी विधवा माताओं से शादी करने पर विचार करना चाहिए। इस शर्त पर कि नए परिवार के साथ मौजूदा परिवार के समान न्याय किया जाएगा।

यदि विवाह मुस्लिम कानून के तहत हुआ है तो एक से अधिक पत्नियां रखने पर मुस्लिम व्यक्ति के खिलाफ द्विविवाह का अपराध नहीं माना जाएगा, लेकिन पहला विवाह विशेष विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम, ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम या हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत किया गया हो और वह इस्लाम धर्म अपनाने के बाद मुस्लिम कानून के अनुसार दूसरा विवाह करता है तो वह अपराध माना जाएगा।

 

 

Courtsy amarujala
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