Prayagraj Magh Mela : मेला सेक्टर-चार स्थित सतुआ बाबा के शिविर में चल रही शिव महापुराण कथा में पं. प्रदीप मिश्रा (सीहोर वाले) ने प्रसाद की दिव्यता और बेलपत्र का महत्व बताया।
मेला सेक्टर-चार स्थित सतुआ बाबा के शिविर में चल रही शिव महापुराण कथा में पं. प्रदीप मिश्रा (सीहोर वाले) ने प्रसाद की दिव्यता और बेलपत्र का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि शिव की थाली से निकला प्रसाद मां लक्ष्मी और भगवान नारायण तक ले जाती है और बैकुंठ मार्ग में जिन देवताओं की उस पर दृष्टि पड़ती है वह प्रसाद उनके हृदय में उतर जाता है। प्रसाद का एक कण का दर्शन मात्र भी सुख और शांति प्रदान करता है।
कथावाचक ने कहा कि बेलपत्र को रोज अधिक मात्रा में खाने से मुंह का स्वाद खराब हो सकता है या छाले भी पड़ सकते हैं इसलिए इसका सीमित उपयोग ही उचित है। लंपी बीमारी होने पर गाय को शिव पर चढ़े बेलपत्र का चूर्ण रोटी में मिलाकर खिलाने से लाभ मिला। बेलपत्र का सेवन केवल औषधि के रूप में सीमित मात्रा में ही करना चाहिए।

शिव तो मृत्यु लोक में हैं, जब पुकारेंगे वह कष्ट हरेंगे
कथावाचक ने कहा कि हमें शिव पूजन करते समय शोर मचाने की जरूरत नहीं कि भोले भंडारी हमारी सुनो। शिव मृत्युलोक में हमारे सबसे निकट हैं। हम उन्हें पुकारते हैं तो वह बगल में खड़े होकर पुकार सुनते हैं। ब्रह्माजी ब्रह्मलोक में हैं, विष्णुजी बैकुंठ और इंद्रदेव इंद्रलोक में रहते हैं लेकिन शिव तो मृत्युलोक में हैं, जब पुकारेंगे वह कष्ट हरेंगे।
शंकर पर जल चढ़ाने वाला सेठ बनता है
कथावाचक ने कहा कि भगवान शंकर की पूजा करने और जल चढ़ाने के लिए लोग तरह-तरह की राय देते हैं। कुछ मामलों में उपचार के दृष्टिकोण से विशेष अर्चन की जरूरत होती है लेकिन कोई कहता है कि ऐसा जल चढ़ाने से यह हो जाएगा, धतूरा चढ़ाया तो वो हो जाएगा लेकिन मैं कहता हूं कि कोई देर से तो कोई जल्दी पर शंकर पर जल चढ़ाने वाला एक दिन सेठ बनता है।

सतुआ बाबा बोले – समापन का मेला बहुत सुंदर
कथा के दौरान सतुआ बाबा ने कहा कि मेले का समापन सुंदर तरीके से हो रहा है। भगवान शिव की कथा सुनने को उमड़े श्रद्धालुओं का कल्याण निश्चित है। कथा के तीसरे दिन भी खाक चौक की सड़कों पर सिर्फ श्रद्धालु ही नजर आ रहे थे। हर तरफ श्रद्धालु पन्नी बिछाए बैठे नजर आए। इस दौरान सुरक्षा के प्रबंध किए गए थे।


कथावाचक पं प्रदीप मिश्रा ने शिव भक्ति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब स्वयं विश्वनाथ अपने हो जाएं, तो संसार का कोई भी सुख मनुष्य से वंचित नहीं रहता। उन्होंने काशी और उज्जैन के उदाहरण देते हुए बताया कि आज के समय में कॉरिडोर की भव्यता में मन उलझ जाता है जबकि मन और चित्त का लगाव भगवान में होना चाहिए। उन्होंने यह भी याद कराया कि रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के जीवन से शिक्षा मिलती है जहां सोने से पहले गुरु, माता-पिता और महादेव का स्मरण किया जाता था। इसका संदेश स्पष्ट था कि आडंबर नहीं बल्कि सच्ची भक्ति और मन से जुड़ाव ही शिव कृपा का मार्ग है।
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