Wednesday, March 11, 2026
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भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

प्रयागराज, 11 मार्च 2026। हिन्दुस्तानी एकेडेमी, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज के तत्वावधान में बुधवार को ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और लोक साहित्य’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन एकेडेमी के गांधी सभागार में दो सत्रों में सम्पन्न हुआ।

 

कार्यक्रम के प्रारम्भ में एकेडेमी परिसर में स्थापित पं. बालकृष्ण भट्ट, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन तथा सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण किया गया। इसके पश्चात सरस्वती प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ संगोष्ठी का विधिवत शुभारम्भ हुआ।

प्रथम सत्र के आरम्भ में एकेडेमी की कोषाध्यक्ष पायल सिंह ने अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, स्मृति चिह्न एवं शॉल भेंट कर किया। स्वागत वक्तव्य में उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ऋषियों-मुनियों द्वारा वेद-उपनिषदों के माध्यम से विकसित हुई है, जिसने लोक साहित्य, जीवन दर्शन और नैतिक मूल्यों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है।

 

 

सत्र की अध्यक्षता करते हुए उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश के पूर्व निदेशक डॉ. आर.पी. सिंह ने कहा कि आदिकाल से ऋषियों और मनीषियों ने अपने तप, साधना और अनुभव से अर्जित ज्ञान को वेदों, पुराणों और उपनिषदों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित किया तथा लोक कथाओं और साहित्य के माध्यम से उसे जनसामान्य तक पहुँचाया।

मुख्य अतिथि प्रो. अजय प्रकाश खरे, प्राचार्य, सी.एम.पी. डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य परस्पर पूरक हैं। लोक साहित्य के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा जन-जन तक पहुँचती है और दोनों मिलकर भारतीय संस्कृति को समृद्ध करते हैं।

 

 

मुख्य वक्ता डॉ. सत्यप्रिय पाण्डेय, श्याम लाल महाविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध करने में जितना योगदान शास्त्रों का है, उतना ही महत्वपूर्ण योगदान लोक का भी रहा है। वेद, पुराण और उपनिषदों के ज्ञान को लोक कवियों, संतों और लोक रचनाकारों ने अपनी भाषा में जनमानस तक पहुँचाया।

विशिष्ट वक्ता डॉ. कल्पना वर्मा, पूर्व आचार्य, आर्यकन्या डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। महर्षियों के चिंतन, अनुभव और जीवन शैली ने सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन को दिशा दी है। यह परंपरा वेद-पुराण, उपनिषद, रामायण-महाभारत, लोक कथाओं, लोक गीतों और कहावतों में सुरक्षित रही है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः”, “वसुधैव कुटुम्बकम” और “अतिथि देवो भव” जैसे संदेश इसी परंपरा की देन हैं।

प्रथम सत्र का संचालन डॉ. सुजीत कुमार सिंह, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, प्रयागराज ने किया।

द्वितीय सत्र के प्रारम्भ में एकेडेमी के प्रशासनिक अधिकारी रतन पाण्डेय ने अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए आद्या प्रसाद सिंह ‘प्रदीप’, सुलतानपुर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा वेदों और शास्त्रों के साथ-साथ लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुई है और समाज के नैतिक, सांस्कृतिक तथा बौद्धिक विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विशिष्ट वक्ता प्रो. राकेश सिंह, आचार्य, इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय ने कहा कि भारतीय समाज में ज्ञान केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा है। वैदिक, दार्शनिक, शास्त्रीय और लोक—इन सभी धाराओं के माध्यम से ज्ञान की परंपरा विकसित हुई है, जिसमें लोक साहित्य सबसे सशक्त माध्यम रहा है।

सहायक आचार्य डॉ. शारदा द्विवेदी, रानी भाग्यवती महिला महाविद्यालय, बिजनौर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण और संवर्धन करना हमारा दायित्व है। देश केवल आर्थिक शक्ति से ही नहीं, बल्कि ज्ञान की शक्ति से भी महाशक्ति बन सकता है।

सम्मानित वक्ता डॉ. रमेश चन्द्र वर्मा, पूर्व सम्पादक, दैनिक जागरण, कानपुर ने कहा कि लोक साहित्य सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक पहचान और राष्ट्रभावना का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके माध्यम से प्रेम, त्याग, साहस, धर्म और कर्तव्य जैसे जीवन मूल्यों का प्रसार होता है।

द्वितीय सत्र का संचालन डॉ. अनिल कुमार सिंह, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने किया।

कार्यक्रम में प्रो. रामकिशोर शर्मा, रामनरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’, डॉ. पवन कुमार सिंह, डॉ. संजय कुमार सिंह सहित अनेक विद्वान, शोधार्थी तथा शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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Anveshi India Bureau

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