यह एक ऐसी कहानी है, जहां संघर्ष, जिम्मेदारियां और मां के त्याग ने मिलकर सफलता की नई इबारत लिख दी। राजकीय इंटर कॉलेज की अध्यापिका वंदना पांडेय के जीवन का सबसे भावुक दिन वह रहा।
यह एक ऐसी कहानी है, जहां संघर्ष, जिम्मेदारियां और मां के त्याग ने मिलकर सफलता की नई इबारत लिख दी। राजकीय इंटर कॉलेज की अध्यापिका वंदना पांडेय के जीवन का सबसे भावुक दिन वह रहा, जब रिटायरमेंट के दिन सोमवार को ही उन्हें अपने बेटे आयुष के एसडीएम बनने की खबर मिली। जैसे ही उन्हें यह सूचना मिली, उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। यह कहानी सिर्फ एक सफलता की नहीं, बल्कि एक मां के अटूट साहस, त्याग और विश्वास की है।
उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) द्वारा रविवार देर रात घोषित पीसीएस 2024 के अंतिम परिणाम में शहर के बालसन चौराहा स्थित बिहार कुंज कॉलोनी निवासी आयुष पांडेय ने 10 वीं रैंक हासिल की है। इस उपलब्धि के साथ उनका चयन उपजिलाधिकारी (एसडीएम) पद पर हुआ है।
लेकिन इस सफलता के पीछे एक लंबा संघर्ष छिपा है। मूल रूप से अमेठी जिले के विशेषरगंज क्षेत्र के देहरा पांडे का पुरवा गांव की रहने वाली वंदना पांडेय के जीवन में वर्ष 2010 सबसे कठिन साबित हुआ। उनके पति सीएम पांडेय, जो डीआरडीए में परियोजना निदेशक थे, एक सड़क दुर्घटना में चल बसे। उस समय बड़ा बेटा आयुष (शिवम) मात्र 14 वर्ष का था और आठवीं कक्षा में पढ़ रहा था, जबकि छोटा बेटा पीयूष भी स्कूली शिक्षा में था।
PCS Result: On the day of retirement itself, the news of the son becoming SDM brought tears of joy to the eyes
पीसीएस में 10वीं रैंक पाने वाले आयुष पांडेय अपनी मां वंदना पांडेय के साथ। – फोटो : अमर उजाला।
पति की असमय मृत्यु के बाद वंदना पांडेय पर परिवार और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी आ गई। प्रतापगढ़ से प्रयागराज स्थानांतरण के बाद उन्होंने नौकरी के साथ-साथ मां और पिता दोनों की भूमिका निभाई। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने दोनों बेटों को न सिर्फ शिक्षित किया, बल्कि उनमें संस्कार और संघर्ष की ताकत भी भरी। बड़े बेटे आयुष पांडेय ने इंटर के बाद गाजियाबाद से बीटेक की पढ़ाई की और फिर दिल्ली में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। छोटे बेटे पीयूष ने भी अपनी मेहनत से रेलवे में इंजीनियर पद हासिल कर परिवार को सहारा दिया।
वंदना पांडेय का सपना था कि उनका बेटा प्रशासनिक सेवा में जाए। बेटे ने पीसीएस में दसवीं रैंक हासिल कर न सिर्फ उनकी उम्मीदों को पूरा किया, बल्कि उनके वर्षों के संघर्ष को भी सार्थक बना दिया। रिटायरमेंट के दिन मिली यह खबर वंदना पांडेय के लिए जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार बन गई। उन्होंने भावुक होकर कहा कि पति की कमी हमेशा खली, लेकिन बच्चों की सफलता ने हर दर्द को कम कर दिया।
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