अतीत के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि बेतिया राज का इतिहास उज्जैन सिंह और गज सिंह से जुड़ा है, जिन्हें बादशाह शाहजहां से राजा की उपाधि मिली थी। 1897 से यह संपत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के प्रबंधन के अधीन है। रानी के ऐतिहासिक राजमहल को धरोहर के रूप में संरक्षित करने की बात कही जा रही है।
बिहार बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की ओर से संगमनगरी समेत यूपी के आठ जिलों में संपत्तियों का चिह्नीकरण कराने के बाद बेतिया राजघराना सुर्खियों में आ गया है। इस राजघराने की आखिरी वारिस महारानी जानकी कुंवर के महल को 229 वर्ष बाद भी वारिसों का इंतजार है। फिलहाल इस राजमहल के रनिवास और अन्य हिस्सों में कहीं सरकारी दफ्तर खुल गए हैं तो कहीं अवैध कब्जा हो चुका है।
अतीत के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि बेतिया राज का इतिहास उज्जैन सिंह और गज सिंह से जुड़ा है, जिन्हें बादशाह शाहजहां से राजा की उपाधि मिली थी। 1897 से यह संपत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स के प्रबंधन के अधीन है। रानी के ऐतिहासिक राजमहल को धरोहर के रूप में संरक्षित करने की बात कही जा रही है। जबकि, उनके वंशज बिहार सरकार के कब्जे से संपत्तियों के मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आजादी के बाद बेतिया राजघराने के उत्तराधिकार को लेकर राजकुमारी बीना सिंह उर्फ पूर्णिमा कुंवर ने अपने पिता महाराजा रमनी सिंह के निधन के बाद इस संपत्ति पर दावा किया था। तब से यह राजपरिवार बिहार के बोर्ड ऑफ रेवेन्यू से अपने हक के लिए लड़ रहा है।



