उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज द्वारा आयोजित साहित्यिक संगोष्ठी में रविवार को विद्वानों एवं वक्ताओं ने माघ मेले के धार्मिक, सांस्कृतिक और लोक-मंगलकारी स्वरूप पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए।
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो. राजेन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि तीर्थराज प्रयाग में माघ मास के दौरान ब्रह्मा द्वारा सौ यज्ञ संपादित किए जाने के कारण ही ऋषि-महर्षियों ने वटवृक्ष के नीचे तपस्या कर कल्पवास परंपरा का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि कालांतर में पुण्य लाभ की भावना से सामान्य जनजीवन में भी कल्पवास की परंपरा प्रचलित हुई।
उन्होंने बताया कि गंगा, यमुना और सरस्वती की पावन त्रिवेणी में स्नान और कल्पवास ही माघ मेले का वास्तविक माहात्म्य है, जो भारतीय आस्था और अध्यात्म की गहराई को दर्शाता है।

डॉ. अजीत कुमार ने अपने विचार रखते हुए कहा कि माघ मेला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और कला का जीवंत उत्सव भी है। उन्होंने कहा कि लोकगीत, भजन, कीर्तन, रामलीला, कथकली तथा संतों के प्रवचन भारतीय कला परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं। साधु-संतों के अखाड़े त्याग, तपस्या और अनुशासन का संदेश देते हैं, जबकि विद्वानों के शास्त्रार्थ धर्म और दर्शन की गहनता को उजागर करते हैं।
डॉ. प्रमोद द्विवेदी ने कहा कि भारतीय जनमानस में माघ मेला लोक-मंगल का प्रतीक माना जाता है। यह मेला केवल तीन नदियों की त्रिवेणी नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और धर्म की त्रिवेणी भी है। उन्होंने कहा कि माघ मेले का भ्रमण करते समय उसकी दिव्यता को व्यक्ति भीतर तक अनुभव करता है।
कार्यक्रम के अंत में आयोजित गायन प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने वाले कलाकारों को कार्यक्रम सलाहकार द्वारा प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
Anveshi India Bureau



