Wednesday, February 18, 2026
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नाटक ” श्वान गान ” का हुआ मंचन

प्रयागराज। स्वराज विद्यापीठ के प्रांगण में स्वराज विद्यापीठ एवं अक्कड़ बक्कड़ फॉउंडेशन के संयुक्तवाधान में नाटक ‘श्वान गान’ का मंचन हुआ।

 

“श्वान गान” (बार्किंग डॉग) एक ऐसा नाटक है जो तीन पात्रों पर केंद्रित है, जिसमें दो पात्र, पीटर और उत्कर्ष हैं। इन दोनों पात्रों के माध्यम से नाटक की कहानी आगे बढ़ती है, और अंत में उत्कर्ष एक आम आदमी की तरह समय चक्र का प्रतीक बन जाता है। यह नाटक संभावनाओं और उम्मीदों से भरपूर है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है। यह नाटक “अपर मिडिलक्लास और लोअर मिडिलक्लास की डिवाइडिंग लाइन क्या है? इसका मतलब यह है कि रेखा के ऊपर और नीचे का अंतर कैसे पता चले?” यह संवाद हमें समाज में वर्ग विभाजन के बारे में सोचने पर मजबूर करता है। “कभी-कभी आदमी को लंबा रास्ता लेना पड़ता है, शॉर्टकट लेने के लिए।” यह संवाद हमें जीवन में सही रास्ता चुनने के बारे में सोचने पर बल देता है। पूरे नाटक में सांकेतिक रूप से कई गहरी छाप दिखाई देती है। जैसे कि सांकेतिक रूप में चिड़ियाघर शब्द बार-बार आता है, जिसका यहां पर अर्थ पिंजरे में कैद जानवरों से है। इसी तरह, इंसान भी परिवार के रूप में कैद रहता है और उसमें रहते हुए अलग-अलग वर्ग बना लेता है। यह परिवार या घर एक छोटा सा चिड़ियाघर है जो हम इंसानरूपी जानवरों को एक साथ में रखता है, लेकिन जिम्मेदारियों में कैद, जिसमें सबके काम बांटे हुए होते हैं। पीटर और उत्कर्ष दोनों पात्र ‘अषाढ़ के एक दिन’ नाटक के कालिदास और विलोम की तरह हैं जिसका आधार मानकर दोनों चरित्रों को उनके हिसाब से रेखांकित करने की कोशिश की गई है, जैसे कि पीटर के अंदर समलैंगिक पक्ष को डाला है। दूसरी ओर, उत्कर्ष जैसे चरित्र को समय और सामाजिक आईने जैसा दिखाया गया है, जो वैश्वीकरण के छलावे, भौतिकवादी दुनिया के अलगाववाद, इंसान के अकेलेपन, गलत संचार और वार्तालाप, सामाजिक असमानता और अमानवीयकरण के विषयों आदि के मुद्दों को रखते हुए अपने अस्तित्व की खोज करता है। यह नाटक अस्तित्ववाद की बात करता है, जो हमें जीवन के अर्थ और अस्तित्व के बारे में सोचने पर बाध्य करता है।

मंच पर

पीटर- सिद्धांत चंद्रा, उत्कर्ष- प्रियांशु शुक्ला, आदमी- कुमार अभिनव, मूकाभिनय – प्रत्यूष वर्सने ‘रिशु’

 

मंच परे

कविता – आशुतोष चंदन, गीत- साहिर लुधियानवी, ध्वनि निर्माण- अमर सिंह, वस्त्र विन्यास- हीर, शालिनी, मंच सामग्री- शीरी,आर्यन, मंच व्यवस्था-शिवम, सत्यम, अभिनव, शरद , मंच संचालन- बृजेंद्र कुमार सिंह

मूल नाटक : एडवर्ड एल्बी, रूपांतरण : विशाल विजय, सह निर्देशन: प्रत्युष वर्सने रिशु, परिकल्पना एवं निर्देशन : निखिलेश कुमार मौर्य

 

 

Anveshi India Bureau

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