Allahabad High Court : टकसाल से 20 रुपये के 13 सिक्के चोरी करने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह सीधे देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा मामला है। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच और मुकदमे दोनों की कार्रवाई साथ-साथ चलेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारत सरकार टकसाल, नोएडा के एक कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच एक साथ चलाने की अनुमति दी है। कोर्ट ने कहा है कि टकसाल सिक्कों की ढलाई के काम में लगा है। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर है। निष्पक्ष जांच से संस्था में पादर्शिता आएगी और कर्मचारियों में विश्वास पैदा होगा।
इस टिप्पणी संग कोर्ट ने विभागीय जांच व निलंबन पर रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी। यह आदेश न्यायमूर्ति अजय भनोट की एकलपीठ ने आनंद कुमार की याचिका पर दिया है। नोएडा स्थित भारत सरकार टकसाल में असिस्टेंट-ग्रेड तृतीय के पद पर याची आनंद कुमार कार्यरत था। उसे 19 दिसंबर 2024 को ड्यूटी के दौरान टकसाल के गेट पर सीआईएसएफ सुरक्षा कर्मियों ने 20 रुपये के 13 सिक्के चोरी करने के आरोप में पकड़ लिया था। इस मामले में उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।
पुलिस ने 27 दिसंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इससे पूर्व टकसाल अधिकारियों ने तीन दिसंबर 2024 को एक आरोप पत्र जारी कर उसके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू कर दी थी। साथ ही याची को 19 दिसंबर 2024 को निलंबित कर दिया गया। याची कर्मचारी ने इस विभागीय जांच व निलंबन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि एक ही मामले में दो कार्यवाही (विभागीय जांच व आपराधिक कार्यवाही) एक साथ नहीं चल सकती है। दोनों कार्यवाही में सबूत समान हैं। ऐसे में विभागीय जांच को जारी रखने से याची के प्रति पूर्वाग्रह उत्पन्न होगा और उसे बचाव में नुकसान होगा।
कोर्ट ने टकसाल में चोरी के आरोप को माना गंभीर मामला
वहीं, प्रतिवादी अधिवक्ता प्रांजल मेहरोत्रा ने दलील दी कि आपराधिक कार्यवाही व विभागीय जांच में सबूत अलग-अलग हैं। साथ दोनों कार्यवाही का उद्देश्य अलग-अलग है। इसलिए दोनों कार्यवाही एक साथ चल सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि याची पर भारत सरकार टकसाल से रुपयों की चोरी करने का आरोप है। ऐसे में गंभीर मामले के आरोपी को संस्था में काम करने देना संस्था के हितों के लिए सही नहीं होगा। टकसाल जैसे संवेदनशील संस्थान के हित में जांच को लंबित रखना उचित नहीं है। कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए विभागीय जांच को आदेश की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ता को जांच की कार्यवाही में सहयोग करने का भी निर्देश दिया गया है।



