Friday, February 27, 2026
spot_img
HomePrayagrajमाननीय उच्च न्यायालय, प्रयागराज के न्याय निर्णय के बावजूद 50 वर्षों से...

माननीय उच्च न्यायालय, प्रयागराज के न्याय निर्णय के बावजूद 50 वर्षों से प्रकाशित पुस्तकों पर प्रतिबंध से शिक्षा जगत में हड़कंप

प्रयागराज, 27 फरवरी 2026। शैक्षिक सत्र 2026-27 के लिए जारी हालिया निर्देशों के विरोध में 27 फरवरी 2026 को दोपहर 3:00 बजे इलाहाबाद न्यूज़ रिपोर्टर्स क्लब, प्रयागराज में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। प्रेस वार्ता में प्रदेश के प्रकाशकों, विद्यालय संचालकों, शिक्षाविदों एवं पुस्तक व्यवसाय से जुड़े प्रतिनिधियों ने लगभग 50 वर्षों से प्रकाशित पुरानी एवं संदर्भ पुस्तकों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर गहरी चिंता एवं आक्रोश व्यक्त किया।

 

माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज की सार्वजनिक विज्ञप्ति दिनांक 23/02/2026 में हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट के शैक्षिक सत्र 2026-27 हेतु पाठ्यपुस्तकों के संबंध में कठोर एवं अनुचित दिशा-निर्देश जारी कर प्रदेश के प्रतिष्ठित प्रकाशकों को “अनधिकृत प्रकाशक/मुद्रक” की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया। विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि तथाकथित अनधिकृत प्रकाशकों की पुस्तकें यदि किसी विद्यालय में पाई जाती हैं तो संबंधित विद्यालय पर पाँच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा तथा उसकी मान्यता समाप्त कर दी जाएगी।

 

उक्त विज्ञप्ति से व्यथित प्रकाशकों ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने हेतु माननीय उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में याचिका संख्या रिट-C No. 6738/2026 (राजीव प्रकाशन एंड कंपनी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार एवं अन्य) दाखिल की। याचिका लंबित रहने के दौरान मा० शि० परिषद, उत्तर प्रदेश, प्रयागराज द्वारा संशोधित विज्ञप्ति दिनांक 31/01/2026 जारी की गई, जिसमें पूर्व विज्ञप्ति दिनांक 08/01/2026 में उपबंधित दंडात्मक प्रावधान (₹5 लाख जुर्माना एवं मान्यता समाप्ति) हटा दिया गया।

 

इसके उपरांत याचिका संख्या रिट-C No. 6738/2026 में पारित निर्णय दिनांक 19/02/2026 के बाद परिषद द्वारा पुनः तीसरी विज्ञप्ति दिनांक 23/02/2026 जारी की गई। इस विज्ञप्ति में संशोधित विज्ञप्ति को प्रभावहीन करते हुए पुनः 08/01/2026 की प्रथम विज्ञप्ति को लागू कर दिया गया तथा ₹5 लाख जुर्माना एवं मान्यता समाप्ति का दंडात्मक प्रावधान पुनः लागू कर दिया गया। साथ ही यह दावा किया गया कि यह कार्यवाही माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय दिनांक 19/02/2026 के अनुपालन में की जा रही है, जबकि माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में निजी प्रकाशकों को खुले बाजार में अपनी प्रकाशित पुस्तकों के विक्रय की स्वतंत्रता प्रदान की है।

 

प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने आरोप लगाया कि न्यायालय के निर्णय का पूर्ण व वास्तविक स्वरूप सार्वजनिक विज्ञप्ति में प्रकाशित नहीं किया गया, बल्कि आंशिक अंश प्रकाशित कर छद्म आच्छादन की स्थिति उत्पन्न की गई है। इससे प्रकाशन व्यवसायियों, शिक्षकों एवं छात्रों में पुनः भ्रम एवं असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

 

वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के निर्णयों के निर्वचन का अधिकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय को है तथा प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक निर्णयों का अक्षरशः अनुपालन करना अनिवार्य है। निर्णय के किसी अंश को सार्वजनिक रूप से गोपित करना न्यायालय की अवमानना के तुल्य हो सकता है।

 

दशकों से विभिन्न निजी प्रकाशकों की पुस्तकें प्रदेश के विद्यालयों में उपयोग की जाती रही हैं तथा उन्होंने विद्यार्थियों के बौद्धिक, नैतिक एवं शैक्षणिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन पुस्तकों की सामग्री गुणवत्ता, शोध एवं अनुभव पर आधारित रही है, जिसके कारण वे शिक्षण प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनी हुई हैं।

 

प्रेस वार्ता में यह भी बताया गया कि इस निर्णय से प्रदेश के प्रकाशन उद्योग, पुस्तक विक्रेताओं, वितरकों, मुद्रण उद्योग, लेखकों एवं शैक्षणिक सामग्री तैयार करने वाले हजारों कर्मचारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अनुमानतः लगभग दो लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे तथा दो लाख से अधिक परिवारों की आजीविका पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। प्रकाशन उद्योग MSME क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है, ऐसे में यह निर्णय सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के लिए गंभीर आर्थिक संकट सिद्ध हो सकता है।

 

प्रतिनिधियों ने कहा कि जहाँ एक ओर प्रदेश सरकार एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य एवं ‘ब्लू इकोनॉमी’ जैसी नीतियों पर कार्य कर रही है, वहीं इस प्रकार का निर्णय शिक्षा एवं प्रकाशन उद्योग के विकास को बाधित कर सकता है। इससे राज्य के राजस्व, रोजगार सृजन एवं उद्यमिता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।

 

यह भी उल्लेख किया गया कि 8 जनवरी 2021 को निजी प्रकाशकों की पुस्तकों को विद्यालयों में चयनित करने की अनुमति प्रदान की गई थी, क्योंकि वे उपयोगी, गुणवत्तापूर्ण एवं विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सहायक पाई गई थीं। वर्तमान निर्णय पूर्व में लिए गए निर्णयों के विपरीत प्रतीत होता है।

 

वक्ताओं ने मांग की कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशों का अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित करते हुए सरकार पारदर्शी एवं स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) एवं राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF 2023) की भावना के अनुरूप बहुविकल्पीय एवं गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिक्षा व्यवस्था को एकल पाठ्यपुस्तक प्रणाली की बाध्यता से मुक्त किया जाना चाहिए। शिक्षक को पाठ्य सामग्री के चयन का विकल्प उपलब्ध होना चाहिए।

 

यह भी कहा गया कि NEP 2020 के क्रियान्वयन को छह वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, किंतु अभी तक उसके मूल सिद्धांतों का पूर्ण अनुपालन नहीं किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा एवं गुणवत्ता बनाए रखना समय की आवश्यकता है।

 

अंत में वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया तो प्रदेश के प्रकाशक, लेखक, विद्यालय प्रबंधक एवं संबंधित संगठन व्यापक स्तर पर आंदोलन करने को बाध्य होंगे।

 

 

Anveshi India Bureau

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments