प्रयागराज। प्रख्यात विदुषी सुदर्शना सिंघल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखित पुस्तक का 15 मार्च को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी बिल्डिंग में इस पुस्तक का एक गरिमामय समारोह में संपन्न हुआ। यह पुस्तक प्रख्यात विदुषी डॉ सुदर्शना सिंघल के जीवन, व्यक्तित्व , साहित्यिक योगदान एवं भारतीय संस्कृति के प्रति उनके गहन दृष्टिकोण को समर्पित है। यह कृति विशेष रूप से एक पुत्र द्वारा अपनी मां को अर्पित भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
पुस्तक में उनके जीवन से जुड़े संस्मरण, अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं के अनुभव तथा उनके महत्वपूर्ण लेखों का संकलन प्रस्तुत किया गया है, जो उनके गहन अध्ययन, चिंतन और लेखन क्षमता को उजागर करता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता सुदर्शना सिंघल जी के सुपुत्र एवं प्रयागराज निवासी प्रसिद्ध चार्टर्ड अकाउंटेंट श्री शाश्वत सिंघल जी एवं श्री शाश्वत जी की पत्नी श्रीमती अनुपम सिंघल द्वारा की गई।
इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रो.डॉ शशि बाला जी एवं प्रो.निर्मला शर्मा जी थीं।
डॉ. शशि बाला जी प्रख्यात इंडोलॉजिस्ट एवं भारतीय विद्या भवन की प्रमुख हैं। भारतीय संस्कृति, दर्शन और विशेष रूप से भारत एशिया सांस्कृतिक सम्बन्धों के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उन्होंने विभिन्न देशों में भारतीय संस्कृति के प्रसार तथा शोध कार्यों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक विरासत को प्रतिष्ठित किया है।
डॉ शशि बाला जी ने उपस्थित अतिथियों के समक्ष बड़े गर्व के साथ बताया कि सुदर्शना जी उनकी गुरु मां थीं तथा निजी जीवन में भी सदैव उनका मार्गदर्शन करती रहीं। आगे बढ़ते हुए उन्होंने बताया कि पुस्तक के कवर पर छपा मंदिर विश्व का सबसे बड़ा शिव मन्दिर है जो इंडोनेशिया के जवा दीप में स्थित है। इस मंदिर के आठ उपमंदिर है। उन्होंने आगे बताया कि कितनी लगन से सुदर्शना जी अपने पिता, आचार्य रघुवीर जी के साथ कार्यरत रहती थी। एक विलक्षण प्रतिभा की धनी, वह एक बहुत अच्छी इंसान भी थी, जिनके मन मे सभी के लिए अपार प्रेम था। विवाह के पश्चात वह एकदम अलग परिवेश के परिवार में आ गई, परंतु अपने स्वभाव से वह वहां भी सबकी चहेती बन गई एवं घर परिवार की जिम्मेदारी के साथ साथ अपना अध्ययन भी करती रहीं।
डॉ. निर्मला शर्मा जी एक कला इतिहासकार हैं और इंटरनेशनल अकादमी ऑफ इंडियन कल्चर में बौद्ध अध्ययन की प्रोफेसर हैं। वह इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स की ट्रस्टी भी है। वह इंटरनेशनल अकादमी ऑफ इंडियन कल्चर की डिप्टी डायरेक्टर तथा कल्चरल सेंटर इन द हेग, the Netherlands की डायरेक्टर भी हैं।
डॉ. निर्मला शर्मा जी ने हमें बताया कि किस प्रकार वह अपने पिता के साथ बैठकर नोट्स बनाती थी।समय की इतनी पाबंद कि पिताजी के पास कार्यालय पहुंचने से पहले अपने बच्चों का सभी काम करके जाती। बहुत ही छोटी आयु में ही उन्होंने कई देशों की यात्रा कर ली थी और अपने कार्य द्वारा अपनी एक अमिट छाप सभी देशों में छोड़ी। वे इतनी लोकप्रिय थीं कि उनके विवाह में अलग अलग देशों से विशिष्ट अतिथि आए और उन्हें अपना आशीर्वाद दिया।
इस अवसर पर उपस्थित विद्वतजनों एवं अतिथियों ने डॉ सुदर्शना सिंघल जी के बहुआयामी व्यक्तित्व और भारतीय सांस्कृतिक विमर्श में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। वक्ताओं ने कहा कि यह कृति न केवल एक स्मरण ग्रन्थ है, अपितु भारतीय संस्कृति के अध्ययन और उसके वैश्विक प्रसार को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
शाश्वत सिंघल ने अपने संबोधन में कहा कि यह अवसर केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि उनकी पूज्य माता Sudarshana Singhal के जीवन, मूल्यों और विरासत को स्मरण करने का एक अत्यंत भावनात्मक एवं पावन क्षण है। उन्होंने उल्लेख किया कि यह पुस्तक एक साधारण जीवनी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कार, सादगी और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण एक प्रेरक जीवन को संजोने का विनम्र प्रयास है। उन्होंने यह भी साझा किया कि इस कृति के संकलन की प्रक्रिया उनके लिए स्मृतियों से पुनः जुड़ने, उन्हें सहेजने और आत्मिक रूप से अनुभव करने की एक गहन यात्रा रही। उनके अनुसार, यह ग्रंथ आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूक करने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध होगा।
अनुपमा सिंघल ने अपने संबोधन में कहा कि यह पुस्तक केवल एक औपचारिक विमोचन नहीं, बल्कि Dr. Sudarshana Devi Singhal के समृद्ध बौद्धिक जीवन, उनकी साधना और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके समर्पण को स्मरण करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने कहा कि यह कृति उनकी उस सतत खोज को अभिव्यक्त करती है, जिसके माध्यम से उन्होंने भारतीय मनीषा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने और स्थापित करने का प्रयास किया। अनुपमा सिंघल ने यह भी रेखांकित किया कि पुस्तक के विभिन्न भाग उनके व्यक्तित्व, यात्राओं और शोध-लेखन के माध्यम से एक समग्र दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, यह ग्रंथ न केवल एक स्मृति-ग्रंथ है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनकर भारतीय संस्कृति के गहन अध्ययन की दिशा में मार्गदर्शन करेगा।
कार्यक्रम का समापन एक भावपूर्ण वातावरण में हुआ, जहाँ सुदर्शना सिंघल जी की स्मृतियाँ और उनकी सांस्कृतिक विरासत सभी के मन में गहरी छाप छोड़ गईं। यह समारोह सुदर्शना सिंघल जी के व्यक्तित्व और कृतित्व की गरिमामयी स्मृति को पुनर्जीवित करते हुए एक अविस्मरणीय सांस्कृतिक अनुभव बनकर संपन्न हुआ।
Anveshi India Bureau



