Shankaracharya Avimukteshwaranand Saraswati : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और अन्य की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। झूंसी थाने में शंकराचार्य और उनके शिष्य मुकुंदानंद समेत अन्य के खिलाफ नाबालिग बच्चों का यौन शोषण करने के मामले में कोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके खिलाफ शंकराचार्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके सहयोगी मुकुंदानंद गिरी को यौन शोषण मामले में अग्रिम जमानत दे दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने आवेदकों, पीड़ितों और शिकायतकर्ता तीनों पक्षों को इस मामले के लंबित रहने तक मीडिया में कोई भी साक्षात्कार देने पर रोक लगा दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने दिया है। स्वामी आशुतोष ब्रह्मचारी ने शंकराचार्य और मुकुंदानंद के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करने की मांग में बीएनएसएस की धारा 173 (4) के तहत विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो) के समक्ष आवेदन किया था।
आरोप था कि जनवरी 2025 (महाकुंभ) से फरवरी 2026 (माघ मेला) के बीच प्रयागराज में दो किशोरों के साथ यौन उत्पीड़न किया गया। विशेष न्यायाधीश के आदेश पर झुंसी थाने में विभिन्न आरोपों में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस मामले में शंकराचार्य व अन्य ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत अर्जी दायर की थी।याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यह प्राथमिकी केवल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की छवि खराब करने के उद्देश्य से दर्ज कराई गई है। पीड़ितों का उनके आश्रम या स्कूल से कभी कोई संबंध नहीं रहा। याची पर झूठे आरोप लगाए गए हैं। वहीं, शिकायतकर्ता व राज्य के अधिवक्ता ने अर्जी का विरोध किया।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टर ने यौन हमले की संभावना से इन्कार नहीं किया। एफएसएल रिपोर्ट मांगी गई है। इससे स्पष्ट होता है कि डॉक्टर की ओर से पीड़ित पर यौन उत्पीड़न की बात नहीं कही गई है। हाईकोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि की यह धारणा आरोप तय होने से पहले जमानत के चरण में लागू नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में आवेदक अग्रिम जमानत के लिए सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं, भले ही उन्होंने पहले सत्र न्यायालय में आवेदन न किया हो। इसी के साथ कोर्ट ने दोनों आवेदकों को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और दो प्रतिभूतियों पर अग्रिम जमानत दे दी।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के वकीलों की दलील
उन्हें झूठा फँसाया गया है।
पीड़ित कभी भी उनके आश्रम में छात्र नहीं थे।
प्राथमिकी देरी से और कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई, जो संदेह पैदा करता है।
घटनाओं की तारीख और स्थान में बार-बार बदलाव (विरोधाभास) हैं।
पीड़ितों को जांच अधिकारी के सामने ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया।
पीड़ित पहले सूचक के प्रभाव में थे।
एक पीड़ित घटना के समय बालिग था।
मेडिकल रिपोर्ट में कोई स्पष्ट चोट या प्रमाण नहीं मिला।
डॉक्टर की राय है कि यौन उत्पीड़न को नकारा नहीं जा सकता, पर ठोस आधार नहीं।
आरोपों का उद्देश्य उनकी छवि खराब करना है।
सूचक का क्रिमिनल इतिहास (21 केस) हैं और वह झूठे मुकदमे करता है।
मीडिया ट्रायल के कारण उन्हें सीधे हाई कोर्ट आना पड़ा।
सरकार की दलील
पहले सेशन कोर्ट जाना चाहिए था, सीधे हाई कोर्ट नहीं।
आरोप गंभीर और जघन्य हैं।
पीड़ितों ने अपने बयान में आरोपों की पुष्टि की है।
आरोपी प्रभावशाली हैं, वे गवाहों को डरा या प्रभावित कर सकते हैं।
जांच में कुछ गवाहों ने पीड़ितों की उपस्थिति साबित की।
पॉक्सो की धारा 29 के तहत आरोपियों के खिलाफ अनुमान बनता है।
याची की दलील
आरोपी बहुत प्रभावशाली हैं, जमानत मिलने पर वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।
अन्य बच्चों के साथ भी शोषण हुआ है।
आरोपी साक्ष्य से छेड़छाड़ कर सकते हैं।
सूचक पर हमला हुआ, जिससे खतरे की बात सामने आती है।
आरोपी जांच के दौरान भी यात्रा (यात्रा/रैली) कर रहे हैं और दबाव बना रहे हैं।
शंकराचार्य होने का दावा विवादित बताया गया।
कोर्ट का विश्लेषण
हाई कोर्ट सीधे जमानत दे सकता है विशेष परिस्थितियों में।
इस केस में Special Judge के आदेश से FIR हुई, इसलिए यह विशेष परिस्थिति मानी गई।
कोर्ट ने कई गंभीर सवाल उठाए
1. एफआईआर दर्ज करने में 6 दिन की देरी, कारण पूजा बताया गया।
2. पीड़ित सूचक के साथ ही रहे, अभिभावकों के पास नहीं थे।
3. पीड़ितों के बयान और प्राथमिकी में तारीख/स्थान अलग-अलग हैं।
4. पीड़ितों ने माता-पिता की बजाय एक अजनबी (सूचक) को बताया, असामान्य व्यवहार।
5. एक पीड़ित घटना के समय बालिग था।
6. मेडिकल रिपोर्ट में कोई स्पष्ट चोट नहीं और निष्कर्ष भी पक्का नहीं।
7. पीड़ित आश्रम के छात्र नहीं बल्कि हरदोई के स्कूल के छात्र थे।
8. मीडिया में पीड़ितों के इंटरव्यू देना पॉक्सो नियमों के खिलाफ है।
9. आरोप और प्रशासनिक विवाद (संगम स्नान) का समय एक ही दिन जो संदेह पैदा करता है।
कोर्ट ने कहा:
धारा 29 का “गुनाह का अनुमान” चार्ज फ्रेम होने से पहले लागू नहीं होता।
इसलिए केवल इस आधार पर जमानत नहीं रोकी जा सकती।
आरोपियों को 50 हजार रुपये के बॉन्ड पर इन शर्तों के साथ जमानत दी गई
सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेंगे
गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे
कोर्ट में उपस्थित रहेंगे
भारत से बाहर नहीं जाएंगे बिना अनुमति
मीडिया में इंटरव्यू नहीं देंगे
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