वरिष्ठ साहित्यकार से.रा.यात्री (10 जुलाई 1932-17 नवंबर 2023) की स्मृति में “से.रा.यात्री : कुछ यादें, कुछ बातें” शीर्षक से प्रकाशित स्मृति ग्रन्थ पढ़कर आदरणीय यात्री जी का बहुत सा अनजाना महान व्यक्तित्व एवं कृतित्व सामने आया। 318 पृष्ठों के इस ग्रंथ के संपादक -प्रसिद्ध साहित्यकार कमलेश भट्ट कमल, अशोक मिश्र और आलोक यात्री हैं। आलोक यात्री आदरणीय यात्री जी के सुपुत्र हैं। निश्चित रूप से यह प्रयास आलोक यात्री का विशेष रूप से माना जाएगा। इसका प्रकाशन अद्विक पब्लिकेशन प्रा. लि. दिल्ली से हुआ है।
इस ग्रंथ को 6 खंडों में विभाजित किया गया है। पहला खंड है-व्यक्तित्व और कृतित्व, दूसरा-मूल्यांकन, तीसरा-संस्मरण, चौथा-मेल-मुलाक़ात, पांचवां-स्मृति शेष और छठा-से. रा.यात्री का रचना संसार।
पूरे ग्रन्थ को पढ़ने के बाद लगता है कि संपादक मंडल ने बड़ी सूझबूझ से सामग्री संकलित और प्रस्तुत की है। प्रयास अत्यंत सराहनीय है। यद्यपि संपादक मंडल ने इस ग्रंथ को युवा पीढ़ी के कथाकारों को समर्पित किया है लेकिन मुझे लगता है, यह ग्रन्थ सभी वर्ग के व्यक्तियों को पढ़ना चाहिए। चाहे वह कथाकार हों या न हों और चाहे वह किसी भी उम्र का हो। इसमें यात्री जी का प्रेरणादायी व्यक्तित्व एवं कृतित्व समग्र रूप से सामने आया है। मेरा तो मानना है कि जिसका लंबे समय तक यात्री जी के साथ निकटता का संबंध रहा होगा उसे भी इसमें कुछ न कुछ जानकारी ऐसी मिलेगी जो उसके पास आज तक न हो। मेरा भी यात्री जी के साथ लगभग 20 वर्ष का काफी निकटता का संबंध रहा है, इसके बावजूद मुझे उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की कई नई जानकारियां इस ग्रंथ को पढ़ने के बाद मिली हैं।
इस ग्रंथ में यात्री जी की पत्नी उषा यात्री जी का भी लेख है। उन्होंने यात्री जी के बचपन से अब तक के सफर के बारे में विस्तार से बताया है।
यात्री जी के बेटे आलोक यात्री का भी एक लेख है जिसमें उन्होंने भी विस्तार से काफी कुछ लिखा है। उन्होंने अपने लेख में यात्री जी के नाम के बारे में एक भ्रांति को भी दूर किया है कि यात्री जी का नाम सेवा राम अग्रवाल से से. रा. यात्री हाईस्कूल का फॉर्म भरते समय नहीं बल्कि काफी समय के बाद वरिष्ठ साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क जी की प्रेरणा से हुआ है। इस तथ्य का खुलासा करना इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि इसी ग्रन्थ में कई नामचीन लेखकों ने उस समय का जिक्र किया जब यात्री जी ने हाइस्कूल का फॉर्म भरा था।
वर्तमान साहित्य के संस्थापक संपादक एवं चर्चित साहित्यकार विभूति नारायण राय जी का भी संबंध यात्री जी के साथ लंबा और गहरी निकटता का रहा है। उनका मानना है कि यद्यपि यात्री जी ने काफी लिखा है और कई सम्मान भी मिले लेकिन जिसके वह हकदार थे वह उन्हें नहीं मिल पाया। उन्होंने अपने लेख में लिखा है कि एक लेखक के रूप में उनका मूल्यांकन तो समय करेगा मैं तो आज उन्हें एक मनुष्य के रूप में याद करना चाहता हूं और मुझे यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं लग रही वह एक अदभुत मनुष्य थे। उन्होंने सदैव अच्छा लेखक बनने के बजाए अच्छा इंसान बनने को अपनी पहली प्राथमिकता पर रखा।
यह सर्व विदित है कि यात्री जी को कुत्तों से बड़ा लगाव था। लेकिन वरिष्ठ रचनाकार सूरज पालीवाल जी ने अपने लेख में अपनी एक स्मृति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक बार आजमगढ़ स्थित जोकहरा गांव में एक साहित्यिक कार्यक्रम में बड़े-बड़े साहित्यकार आए थे। सभी रात में अनौपचारिक बातों में मस्त रहे और यात्री जी गांव के एक कुत्ते को अपनी गोद में लेकर पूरी रात उसे ऐसे सहलाते रहे जैसे कोई अपने बच्चे को गंभीर रूप से बीमार होने पर सहलाता है। इस उदाहरण को उन्होंने बहुत मार्मिक ढंग से लिखा है। यह एक सच्चा उदाहरण यात्री जी के व्यक्तित्व को उच्चतम शिखर पर ले जाता है।
अनंत अन्वेषी (इन पंक्तियों के लेखक) ने अपने लेख में एक ऐसे तथ्य को उजागर किया है जो शायद ही किसी को पता हों कि वरिष्ठ साहित्यकार यात्री जी मूलतः चित्रकार थे। अनंत अन्वेषी ने जब यात्री जी से जुड़ी हुई अपनी कई स्मृतियों को जोड़कर उनके सामने रखा तो यात्री जी ने भी स्वीकार किया कि वह मूलतः चित्रकार हैं। क्या कारण थे जिससे वह चित्रकार के बजाए साहित्यकार बने। इसका खुलासा भी उन्होंने अन्वेषी से एक मुलाक़ात में विस्तार से किया है। इस तथ्य को लेख में विस्तार से दिया गया है।
ऐसी बहुत सी अनजानी जानकारियां इस ग्रंथ को पढ़ कर मिलेंगी।
वरिष्ठ रचनाकार कमल भट्ट कमल जी ने इस ग्रंथ में 11 पृष्ठों की संपादकीय लिखी है। संपादकीय लंबी जरूर है लेकिन दिलचस्प और ज्ञानवर्धक है। उनकी यात्री जी के साथ 30 वर्षों की गहरी निकटता रही है। इसलिए उन्होंने यात्री जी के प्रेरणादायक व्यक्तित्व एवं कृतित्व को काफी विस्तार से बताया है।
इस ग्रन्थ में कई चर्चित एवं प्रतिष्ठित महानुभावों के लेख, संस्मरण, साक्षात्कार तथा यात्री जी की कहानी व उपन्यासों की समीक्षा इत्यादि हैं। इसके साथ ही यात्री जी की चुनिंदा रचनाएं भी इस ग्रंथ में दी गईं हैं।
संपादक मंडल ने इस ग्रंथ के माध्यम से से. रा. यात्री जी को नए सिरे से रेखांकित और प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। संक्षेप में कहा जाए तो यह ग्रन्थ गागर में सागर जैसा है। पूरे संपादक मंडल को इस स्तुत्य प्रयास के लिए बहुत बहुत हार्दिक बधाई एवं खूब सारी
शुभकामनाएं….
अनंत अन्वेषी।



